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Tuesday, April 26, 2011

कमजोर नींव

’’ कमजोर नींव ’’

प्रेम बाबू ने षादी के तुंरत बाद गांव के साथ अपने एक जोड़ी माता-पिता को अलविदा कह कर अपनी अदद बीवी के साथ दिल्ली के एक पाॅष इलाके में डेरा जमां लिया था। कुछ ही समय बाद उनकी मार्डन बीवी के न चाहते हुए भी ऊपर वाले ने उनके घर एक प्यारा सा बेटा भेज दिया। प्रेम बाबू की मैंडम आधुनिक और आजाद ख्याल की मालिक होने के साथ एक मल्टीनैषनल कम्पनी में महत्वपूर्ण औदे पर आसीन थी। अपनी पर्सनैलिटी की फिक्र के चलते मैंडम साहिबा ने अपने बेटे को मां के दूध से महरूम रखते हुए उसका काम भी बाजार में मिलने वाले डिब्बाबंद दूध से ही चलाया था। इन्हें अपने पति और बेटे से अधिक हर समय अपने बाॅस का ख्याल रहता था, कि उन्होने खाना और दवा समय पर ली या नही। अगर उनकी बीवी मायके गई है तो घर से उनकी पंसद का सारा खाना तैयार करना मैंडम की सबसे पहली प्राथमिकताओ में से एक होती है।

आज सुबह से ही सारे षहर में सुहावने मौसम के बावजूद प्रेम बाबू के घर में तुफान का महौल बना हुआ था। इससे पहले कि यह तुफान सारे घर में तबाई मचा दे प्रेम बाबू दौड़-दौड़ कर अपनी पत्नी के काम में हाथ बंटा रहे थे। अब आप सोच रहे होगे कि अगर सारे षहर का मौसम खुषनुमा था तो प्रेम बाबू के घर सुनामी जैसा खतरा क्यूं मंडरा रहा था? जी हजूर इसका छोटा सा कारण यह था कि इनकी नौकरानी जो घर में खाना बनाने के साथ इनके बेटे की देखभाल करती थी वो अचानक बिना बताऐ छुट्टी कर गई थी। अभी यह सारी तनावपूर्ण हलचल चल ही रही थी कि अचानक बडे़ जोर से दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर मां और बाबू जी को कई बरसों के बाद देखने पर प्रेम बाबू के चेहरे पर खुषी की जगह ऐसे भाव आ रहे थे जैसे उसके सिर पर बिजली कौंध गई हो। औपचारिकता निभाते हुए प्रेम बाबू ने कहा कि आने से पहले कोई संदेष भेज देते तो मैं खुद स्टेषन पर आ जाता। प्रेम बाबू की मां ने कहा कि बेटा सदेंषा तो गैरो को भेजा जाता है, अपने घर आने के लिये कैसा संदेष?

किसी तरह हिम्मत जुटा कर प्रेम बाबू ने अपनी पत्नी को गांव से मां और बाबू के आने की सूचना दी। प्रेम बाबू की पत्नी दफतर जाने की जल्दी में सास-ससुर को बिना कोई चाय-नाष्ता पूछे ही अपना बैग और बेटे को लेकर चल दी। जैसे तैसे प्रेम बाबू ने अपनी मां के साथ मिल कर कुछ खाने पीने का इंतजाम किया। मां ने बेटे से पूछा कि बहू पोते को क्यूं साथ ले गई है? प्रेम बाबू ने बताया कि आज हमारे यहां काम करने वाली नौकारानी नही आई, यह अब उसे पड़ोस में काम करने वाली एक बाई के यहां छोड़ कर जायेगी। खैर आप बताओ कि अचानक दिल्ली आने का कैसा प्रोग्राम बना लिया? इससे पहले की मां कुछ बोलती बाबू जी ने बताया कि तुम्हारी मंा को हर समय पेट में दर्द रहता है, गांव के डाॅक्टर ने कुछ और टैस्ट करवाने के लिये कहा जो सिर्फ दिल्ली में ही हो सकते थे। बस इसीलिये एक दम से यहां आना पड़ा। प्रेम बाबू ने माफी मांगते हुए कहा कि आज बिल्कुल चिंता न करें, आज तो मेरा दफतर जाना बहुत जरूरी है लेकिन एक दो दिन में छुट्टी लेकर में खुद साथ चल कर सारे टैस्ट करवां दूंगा।

प्रेम बाबू के पिता ने कहा बेटा तू फिक्र मत कर। मैं पहले भी कई बार यहां आ चुका हॅू यह थोड़े से टैस्ट तो मैं खुद ही करवां लूंगा। कुछ ही देर में मां और बाबू जी अस्पताल के सारे कागज संभाल कर टैस्ट करवाने के लिये निकल पड़े। अस्पताल से घर वापिस आते समय जब उनका आटोरिक्षा लाल बत्ती पर रूका तो मैले कुचैले कपड़े पहने एक औरत छोटा सा बच्चा उठाऐ उनसे भीख मांगने लगी। बर्जुग लोग अक्सर कहते है कि अपना खून अपना ही होता है। प्रेम बाबू की मां ने बाबू जी से कहा कि यह बच्चा तो बिल्कुल अपने पौते की तरह लग रहा है। बाबू जी ने उसे डांटते हुए कहा कि तुम भी न जानें क्या-क्या सोचती रहती हो? यह भिखारी का बच्चा हमारा पौता कैसे हो सकता है?

देर षाम को जब बहू अपने बेटे को घर लेकर आई तो प्रेम बाबू की मां ने झट से बच्चे के पैर को गौर से देखा। प्रेम बाबू ने जब इसका कारण पूछा तो मां ने उसे घर के एक कोने में ले जाकर सारी बात बता दी। मां की बात सुनते ही प्रेम बाबू के पैरो तले की जमीन खिसक गई। उसने किसी तरह यह बात अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास किया। पहले तो मैंडम सहिबा आग बबूला हो उठी, फिर पति के बार-बार कहने पर उस बाई को बुला कर बात करने को मान गई। जैसे ही उसे पुलिस के हवाले करने की धमकी दी तो उसने झट से मान लिया कि जब आप लोग काम पर चले जाते हो तो हम आपके बच्चो को अपने साथ ले जा कर चैराहो पर भीख मांगते है। इतने सुदर बच्चो को देख कर लोग काफी अच्छे पैसे दे देते है। बाबू जी को कुछ समझ नही आ रह था कि गांव के इतने बड़े जमींदार घराने के पौते से किस प्रकार सड़क पर भीख मंगवाई जा रही है।

एक समझदार इंसान की तरह उन्होने ने अपना संतलुन बनाते हुए अपनी बहू को कहा कि हम जानते है कि हमारे यह सीधे-साधे वस्त्र देखकर तुम हमें छोटा समझ रही हो और हम लोग तुम्हें अच्छे नही लगते? लेकिन एक बात कभी मत भूलो कि कोई कितना भी बुरा क्यों न हों उसमें अनेक गुण विद्यमान रहते है। बेटा षहर में रह कर पैसा कमाना बहुत जरूरी है लेकिन इस बात को कैसे झुठला सकते हो कि जो बच्चे नौकरो की उंगली पकड़ कर चलना सीखते है उनको बाद में अपने मां-बाप के साथ चलने में षर्म आती है। आप चाहे सारी उंम्र अपने बेटे को किसी चीज की कमी न होने दे, लेकिन एक समय वो आपके हर काम में कमीयां निकालेगा। जिन बच्चो को नौकर और बाईयां बोलना सिखाते है उनके मां-बाप को सदा अपषब्द सुनने को मिलते है। ऐसे बच्चो को आप चाहे सारी उंम्र सहारा समझ कर पालते रहो लेकिन मुसीबत के समय वह आपको बेहसाहरा छोड़ देते है। उस समय आप जैसे मां-बाप के पास अपने गमों और दुखो को लेकर रोने के सिवाए कोई चारा नही बचता।

इस सारे नजारे को देखने के बाद जौली अंकल भी युवा पैरेन्टस को यही सदेंष देना चाहते है कि यदि आप उम्मीद करते हो कि आपके बच्चे हर समय ताजे फूलों की हंसते-मुस्कुराहते हुए अच्छे नागरिक बने तो यह तभी मुमकिन है जब छोटे बच्चो को माता-पिता से अच्छे संस्कार मिलेगे। कोई भी इमारत तब तक मजबूत नही बन सकती जब तक उसकी नींव कमजोर हो।

’’जौली अंकल’’

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