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Friday, May 20, 2011

जोली अंकल का एक और रोचक लेख आप के लिए

’’ पारखी नजर ’’

बंसन्ती ने वीरू से कहा कि आप तो हर समय अपनी अक्कल के घोड़े दौड़ाते रहते हो, क्या मैं आपको 35 साल की लगती हॅू। वीरू ने कहा कि कौन बेवकूफ अब तुम्हें 35 साल की कहता है, जब थी उस समय लगती थी। बंसन्ती ने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा कि मैं तो तुम्हें बहुत पारखी समझती थी लेकिन तुम हो अक्ल के पीछे लठ लिए फिरते रहते हो। अच्छा अब फालतू की बाते छोड़ो मुझे बस इतना बता दो कि तुम मुझे कितना प्यार करते हो? वीरू ने कहा कि यह कोई कहने की बात है, इतना तो तुम भी जरूर जानती होगी कि मै तो तुम्हे बेहिसाब प्यार करता हॅू। बंसन्ती ऐसे नही फिर भी ठीक से बताओ तो सही, मुझे अच्छा लगेगाा। वीरू ने कहा कि मै तो तुम्हारा झूठा जहर भी पी सकता हॅू, अगर एतबार न हो तो किसी दिन भी परख लेना क्योकि तुम तो खुद ही बहुत बड़ी पारखी नजर रखती हो।

एक दिन वीरू अपने बाल कटवाने के लिये नाई की दुकान पर गये। जैसा कि हर कोई जानता है कि अधिकांश नाई लोग अपना काम करते समय एक पल भी चुप नहीं रह सकते। वो किसी न किसी विषय पर अपनी राय देते ही रहते हैं। फिर चाहे वो गली-मुहल्ले की कोई परेषानी हो या देष की कोई गम्भीर समस्या। वीरू से बात करते-करते मुद्दा भगवान के होने या न होने पर आकर रुक गया। वीरू के लाख समझाने पर भी नाई अपनी बात पर अड़ा रहा कि दुनिया में भगवान नाम की कोई चीज नहीं है।

यदि भगवान सचमुच होता, तो फिर दुनियॉ में हर तरफ यह दुख ही दुख, गरीबी, भुखमरी, कत्ल और लूटपाट क्यो होते? लोग बीमार क्यूं होते? बच्चे अनाथ क्यंू होते? अस्पताल मरीजों से यंू तो न भरे रहते, गरीबी और लाचारी की वजह से लोग आत्महत्या क्यंू करते? आप कहते हो कि भगवान सबको बहुत प्यार करते हैं। तो क्या भगवान को अपने प्रियजनों का तड़पते देख यह सब कुछ अच्छा लगता है? जब वीरू की भगवान के आस्तित्व के बारे में सभी दलीलें फेल हो गईं तो वो बुझे मन से अपना काम खत्म होते ही एक समझदार इन्सान की तरह चुपचाप उस नाई को पैसे देकर चल दिय, क्योंकि मुसद्दी लाल जी इस बात को अच्छी तरह से समझते है कि कभी भी किसी मूर्ख से नही उलझना चहिये क्योंकि ऐसे में वहां खड़े सभी देखने वाले को दोनों ही मूर्ख प्रतीत होते है।

जैसे ही वीरू उस नाई की दुकान से बाहर आया, तो उन्होंने देखा की उस बस्ती में काफी सारे लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। मुसद्दी लाल तुरन्त वापिस आये और उस नाई से बोले कि मुझे लगता है, कि तुम्हारी सारी बस्ती में कोई भी नाई नहीं है। नाई ने हैरान होते हुए कहा, कि यह आप क्या कह रहे हो? अभी तो मैने तुम्हारे बाल काटकर ठीक किये है, और तुम कह रहे हो कि यहां कोई नाई नहीं रहता। वीरू ने अब अपनी बात कहनी षुरू की, जैसे ही मैं तुम्हारी दुकान से बाहर निकला तो मैंने देखा कि बहुत से लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ यहां-वहां घूम रहे हैं। नाई बोला उससे क्या होता है? मैं तो यहां अपना काम कर रहा हूं,। अब जब तक कोई मेरे पास आयेगा ही नहींे तो मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ कर तो उनके बाल नही संवार सकता।

अब बात पूरी तरह से वीरू की पकड़ में आ गई। उन्होंने उस नाई को समझाना षुरू किया कि तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। जैसे यह लोग जब तक तुम्हारे पास नहीं आते, तब तक तुम इनके लिये कुछ नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही भगवान तो इसी दुनिया में है, लेकिन जब तक हम लोग उसके करीब नही जायंेगे, तब तक वो हमारे लिये क्या कर सकता है? उसकी मदद और आषीर्वाद के बिना तो हमें हर प्रकार के दुख और तकलीफों का सामना करना ही पड़ेगा। प्रभु का आर्षीवाद पाने के लिए हमें ने कर्म करने होगे। कर्म किए बिना फल की इच्छा करना ठीक वैसा ही है जैसे पेड़ लगाए बगैर फल की उम्मीद में बैठे रहना। जो व्यक्ति इस तरह की छोटी-छोटी बातों को सही-सही समझ लेता है उसी की नज़र पारखी बन जाती है।

कहने को तो विज्ञान तेज़ी से तरक्की कर रहा है, परंतु सच्चाई यह है कि हम वास्वतिक जिंदगी की असलियत को भूलते जा रहे हैं। नतीजतन हम अपने परिवार, और समाज के साथ-साथ भगवान से भी दूर होते जा रहे हैं। जो कोई भगवान के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान या आस्था रखता है, वो खुद को अंहकारवश बड़ा विद्ववान और दूसरो को मूर्ख समझने लगता है। किसी धर्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी या यू कहियें कि आधा-अधूरा ज्ञान रखने वालों का घंमड तो सातवें आसमान पर देखने को मिलता है। वो बाकी समाज के लोगो को हर समय यह जताना नहीं भूलते की वो भगवान के सबसे नज़दीक और खास है। जबकि पारखी नज़र वाले तो यही मानते है कि जिस तरह सूरज एक, चांद एक है उसी तरह भगवान भी एक है बस सिर्फ उसके नाम अनेक है। ऐसे लोगो का यह अटूट विष्वास होता है कि प्रभु को किसी भी नाम से पुकारा जायें वो हर किसी की सुनता है।

अंधविष्वासी लोग अक्सर यह कहते है कि क्या आज तक किसी ने भगवान को देखा है? क्या कोई भगवान को देख सकता है? जिस चीज को हम देख नहीं सकते, क्या उसका अस्तित्व कैसे हो सकता हैं? यह कुछ ऐसे प्रष्न है, जिनका जवाब आज तक षायद किसी को नहीं मिल पाया। परंतु पारखी लोगो की माने तो उनका कहना है कि भगवान की बात तो छोड़ो, क्या कभी किसी ने फूलो की खुषबू या अपने सिरदर्द को देखा है? हम केवल ऐसी चीजो को महसूस ही कर सकते हैं। अगर हमने यह छोटी-छोटी चीजे नहीं देखी, तो भगवान के अस्तित्व पर प्रष्न उठाने वालों की समझ के बारे में क्या कहंे?

जिस प्रकार किसी जानवर को मंहगे सोने-चांदी और हीरे-मोतियों की समझ नही होती, वो उन्हें छोड़ कर भी घास के पीछे ही भागते है। इसका मतलब यह तो नहीं कि हीरे-मोतियो की कोई पहचान या कीमत खत्म हो गई, ठीक उसी तरह भगवान तो हर कण-कण से लेकर छोटे-बड़े जीव में मौजूद है। जौली अंकल की सोच तो यही कहती है कि भगवान को देखने के लिये केवल एक सच्चे हृदय एवं पारखी नजर की जरूरत है। सितारों की दूरी और समुंद्र की गहराई को मापने का दावा करने वालों से भी वो इंसान महान है जो दूसरों के साथ खुद को जानने के लिये पारखी नज़र रखता है।

जोली अंकल का एक और रोचक लेख

’’ पारखी नजर ’’

बंसन्ती ने वीरू से कहा कि आप तो हर समय अपनी अक्कल के घोड़े दौड़ाते रहते हो, क्या मैं आपको 35 साल की लगती हॅू। वीरू ने कहा कि कौन बेवकूफ अब तुम्हें 35 साल की कहता है, जब थी उस समय लगती थी। बंसन्ती ने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा कि मैं तो तुम्हें बहुत पारखी समझती थी लेकिन तुम हो अक्ल के पीछे लठ लिए फिरते रहते हो। अच्छा अब फालतू की बाते छोड़ो मुझे बस इतना बता दो कि तुम मुझे कितना प्यार करते हो? वीरू ने कहा कि यह कोई कहने की बात है, इतना तो तुम भी जरूर जानती होगी कि मै तो तुम्हे बेहिसाब प्यार करता हॅू। बंसन्ती ऐसे नही फिर भी ठीक से बताओ तो सही, मुझे अच्छा लगेगाा। वीरू ने कहा कि मै तो तुम्हारा झूठा जहर भी पी सकता हॅू, अगर एतबार न हो तो किसी दिन भी परख लेना क्योकि तुम तो खुद ही बहुत बड़ी पारखी नजर रखती हो।

एक दिन वीरू अपने बाल कटवाने के लिये नाई की दुकान पर गये। जैसा कि हर कोई जानता है कि अधिकांश नाई लोग अपना काम करते समय एक पल भी चुप नहीं रह सकते। वो किसी न किसी विषय पर अपनी राय देते ही रहते हैं। फिर चाहे वो गली-मुहल्ले की कोई परेषानी हो या देष की कोई गम्भीर समस्या। वीरू से बात करते-करते मुद्दा भगवान के होने या न होने पर आकर रुक गया। वीरू के लाख समझाने पर भी नाई अपनी बात पर अड़ा रहा कि दुनिया में भगवान नाम की कोई चीज नहीं है।

यदि भगवान सचमुच होता, तो फिर दुनियॉ में हर तरफ यह दुख ही दुख, गरीबी, भुखमरी, कत्ल और लूटपाट क्यो होते? लोग बीमार क्यूं होते? बच्चे अनाथ क्यंू होते? अस्पताल मरीजों से यंू तो न भरे रहते, गरीबी और लाचारी की वजह से लोग आत्महत्या क्यंू करते? आप कहते हो कि भगवान सबको बहुत प्यार करते हैं। तो क्या भगवान को अपने प्रियजनों का तड़पते देख यह सब कुछ अच्छा लगता है? जब वीरू की भगवान के आस्तित्व के बारे में सभी दलीलें फेल हो गईं तो वो बुझे मन से अपना काम खत्म होते ही एक समझदार इन्सान की तरह चुपचाप उस नाई को पैसे देकर चल दिय, क्योंकि मुसद्दी लाल जी इस बात को अच्छी तरह से समझते है कि कभी भी किसी मूर्ख से नही उलझना चहिये क्योंकि ऐसे में वहां खड़े सभी देखने वाले को दोनों ही मूर्ख प्रतीत होते है।

जैसे ही वीरू उस नाई की दुकान से बाहर आया, तो उन्होंने देखा की उस बस्ती में काफी सारे लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। मुसद्दी लाल तुरन्त वापिस आये और उस नाई से बोले कि मुझे लगता है, कि तुम्हारी सारी बस्ती में कोई भी नाई नहीं है। नाई ने हैरान होते हुए कहा, कि यह आप क्या कह रहे हो? अभी तो मैने तुम्हारे बाल काटकर ठीक किये है, और तुम कह रहे हो कि यहां कोई नाई नहीं रहता। वीरू ने अब अपनी बात कहनी षुरू की, जैसे ही मैं तुम्हारी दुकान से बाहर निकला तो मैंने देखा कि बहुत से लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ यहां-वहां घूम रहे हैं। नाई बोला उससे क्या होता है? मैं तो यहां अपना काम कर रहा हूं,। अब जब तक कोई मेरे पास आयेगा ही नहींे तो मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ कर तो उनके बाल नही संवार सकता।

अब बात पूरी तरह से वीरू की पकड़ में आ गई। उन्होंने उस नाई को समझाना षुरू किया कि तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। जैसे यह लोग जब तक तुम्हारे पास नहीं आते, तब तक तुम इनके लिये कुछ नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही भगवान तो इसी दुनिया में है, लेकिन जब तक हम लोग उसके करीब नही जायंेगे, तब तक वो हमारे लिये क्या कर सकता है? उसकी मदद और आषीर्वाद के बिना तो हमें हर प्रकार के दुख और तकलीफों का सामना करना ही पड़ेगा। प्रभु का आर्षीवाद पाने के लिए हमें ने कर्म करने होगे। कर्म किए बिना फल की इच्छा करना ठीक वैसा ही है जैसे पेड़ लगाए बगैर फल की उम्मीद में बैठे रहना। जो व्यक्ति इस तरह की छोटी-छोटी बातों को सही-सही समझ लेता है उसी की नज़र पारखी बन जाती है।

कहने को तो विज्ञान तेज़ी से तरक्की कर रहा है, परंतु सच्चाई यह है कि हम वास्वतिक जिंदगी की असलियत को भूलते जा रहे हैं। नतीजतन हम अपने परिवार, और समाज के साथ-साथ भगवान से भी दूर होते जा रहे हैं। जो कोई भगवान के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान या आस्था रखता है, वो खुद को अंहकारवश बड़ा विद्ववान और दूसरो को मूर्ख समझने लगता है। किसी धर्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी या यू कहियें कि आधा-अधूरा ज्ञान रखने वालों का घंमड तो सातवें आसमान पर देखने को मिलता है। वो बाकी समाज के लोगो को हर समय यह जताना नहीं भूलते की वो भगवान के सबसे नज़दीक और खास है। जबकि पारखी नज़र वाले तो यही मानते है कि जिस तरह सूरज एक, चांद एक है उसी तरह भगवान भी एक है बस सिर्फ उसके नाम अनेक है। ऐसे लोगो का यह अटूट विष्वास होता है कि प्रभु को किसी भी नाम से पुकारा जायें वो हर किसी की सुनता है।

अंधविष्वासी लोग अक्सर यह कहते है कि क्या आज तक किसी ने भगवान को देखा है? क्या कोई भगवान को देख सकता है? जिस चीज को हम देख नहीं सकते, क्या उसका अस्तित्व कैसे हो सकता हैं? यह कुछ ऐसे प्रष्न है, जिनका जवाब आज तक षायद किसी को नहीं मिल पाया। परंतु पारखी लोगो की माने तो उनका कहना है कि भगवान की बात तो छोड़ो, क्या कभी किसी ने फूलो की खुषबू या अपने सिरदर्द को देखा है? हम केवल ऐसी चीजो को महसूस ही कर सकते हैं। अगर हमने यह छोटी-छोटी चीजे नहीं देखी, तो भगवान के अस्तित्व पर प्रष्न उठाने वालों की समझ के बारे में क्या कहंे?

जिस प्रकार किसी जानवर को मंहगे सोने-चांदी और हीरे-मोतियों की समझ नही होती, वो उन्हें छोड़ कर भी घास के पीछे ही भागते है। इसका मतलब यह तो नहीं कि हीरे-मोतियो की कोई पहचान या कीमत खत्म हो गई, ठीक उसी तरह भगवान तो हर कण-कण से लेकर छोटे-बड़े जीव में मौजूद है। जौली अंकल की सोच तो यही कहती है कि भगवान को देखने के लिये केवल एक सच्चे हृदय एवं पारखी नजर की जरूरत है। सितारों की दूरी और समुंद्र की गहराई को मापने का दावा करने वालों से भी वो इंसान महान है जो दूसरों के साथ खुद को जानने के लिये पारखी नज़र रखता है।

Thursday, May 19, 2011

खिलौना माटी का - जोली अंकल का नया लेख

’’ खिलोना माटी का ’’

एक लड़की मरने के बाद भगवान के द्वार पर पहुंची तो प्रभु उसे देख कर हैरान हो गये कि तुम इतनी जल्दी स्वर्गलोक में कैसे आ गई हो? तुम्हारी आयु के मुताबिक तो तुम्हें अभी बहुत उम्र तक धरती पर जीना था। उस लड़की ने प्रभु परमेष्वर को बताया कि वो किसी दूसरी जाति के एक लड़के से बहुत प्यार करती थी। जब बार-बार समझाने पर भी हमारे घरवाले इस षादी के लिये राजी नही हुए तो हमारे गांव के चंद ठेकेदारों ने हमें मौत का हुक्म सुना दिया। इससे पहले कि वो हमें जान से मारते हम दोनों ने अपनी जिंदगी को खत्म करने का मन बना लिया। भगवान ने हैरान होते हुए कहा लेकिन तुम्हारा प्रेमी तो कहीं दिखाई नही दे रहा, वो कहां है? जब दूसरे देवताओ ने मामले की थोड़ी जांच-पड़ताल की गई तो मालूम हुआ कि यह दोनों मौत को गले लगाने के लिये इक्ट्ठे ही एक पहाड़ी पर आये थे। जब लड़की कूदने लगी तो इसके प्रेमी ने यह कह कर आखें बंद कर ली कि प्यार अंधा होता है। अगले पल जब उसने देखा कि लड़की तो कूद कर मर गई है वो वहां से यह कह कर वापिस भाग गया कि मेरा प्यार तो अमर है, मैं काये को अपनी जान दू।

यह सारा प्रंसग सुनने के बाद वहां बैठे सभी देवताओं के चेहरे पर क्रोध और चिंता की रेखाऐं साफ झलकने लगी थी। काफी देर विचार विमर्ष के बाद यह तय हो पाया कि समय-समय पर जब कभी भी स्वर्गलोक में कोई इस तरह की अजीब समस्यां देखने में आती है तो नारद मुनि जी से ही परामर्ष लिया जाता है। सभी देवी-देवताओं की सहमति से परमपिता परमेष्वर ने उसी समय नारद मुनि को यह आदेष दिया कि हमने तो पृथ्वीलोक पर एक बहुत ही पवित्र आत्मा वाला षुद्व माटी का खिलोना बना कर भेजा था। लेकिन यह वहां पर कैसे-कैसे छल कपट कर रहा है। इसके बारे में खुद धरती पर जाकर जल्द से जल्द वहां का सारा विवरण हमें बताओ।

नारद जी प्रभु के हुक्म को सुनते ही नारायण-नारायण करते हुए वहां से धरती की और निकल पड़े। धरती पर पांव रखते ही उनका सामना उस बेवफा प्रेमी से हो गया जिसने उस लड़की को धोखा देकर मौत के मुंह में धकेल दिया था। वो षराब के नषे में टुन झूमता हुआ अपनी मस्ती में हिंदी फिल्म के एक गाने को गुनगुना रहा था कि मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये। नारद मुनि जी को देखते ही वो षराबी उनसे बोला कि भाई तुम कौन? नारद जी ने कहा कि लगता है तुमने मुझे पहचाना नही। उस षराबी ने कहा कि यह दारू बड़ी कमाल की चीज है यह अपने सारे दुखो से लेकर दुनियां के सारे गम तक भुला देती है। नारद जी ने अपना परिचय देते हुए मैं स्वर्गलोक से आया हॅू। यह सुनते ही षराबी ने नारद जी की खिल्ली उड़ाते हुए से कहा कि फिर तो यहां मेरे साथ बैठो, मैं अभी आपके लिये दारू मंगवाता हॅू। नारद जी कुछ ठीक से समझ नही पाये कि यह किस चीज के बारे में बात कर रहा है। फिर भी उन्होने इसे कोई ठंडा पेयजल समझ कर बोतल मुंह से लगा कर कर एक ही घूंट में उसे खत्म कर डाला। षराबी बड़ा हैरान हुआ कि हमें तो एक बोतल को खत्म करने में 4-6 घंटे लग जाते है और यह कलाकार तो एक ही झटके में सारी बोतल गटक गया। उसने एक और बोतल नारद जी के आगे रख दी। अगले ही क्षण वो भी खाली होकर जमीन पर इधर-उधर लुढ़क रही थी। इसी तरह जब 4-6 बोतले और खाली हो गई तो उस षराबी ने नारद जी से पूछा कि तुम्हें यह दारू चढ़ती नही क्या? नारद जी ने कहा कि मैं भगवान हॅू, मुझे इस तरह के नषों से कुछ असर नही होता। अब उस षराबी ने लड़खड़ाती हुई जुबान में कहा कि अब घर जाकर आराम से सो जाओ तुम्हें बुरी तरह से दारू चढ़ गई है। वरना पुलिस वाले तुम्हें दो-चार दिन के लिए कृश्ण जी की जन्मभूमि पर रहने के लिये भेज देगे। नारद जी को बड़ा अजीब लगा कि यह दो टक्के का आदमी सभी लोगो के बीच मेरी टोपी उछाल रहा है। सब कुछ जानते हुए भी नारद जी ने इस षराबी को गुस्सा करने की बजाए इसी से धरती के हालात के बारे में विस्तार से जानना बेहतर समझा।

जब षराबी के साथ थोड़ी दोस्ती का महौल बन गया तो उसने बताना षुरू किया कि आज धरती पर चारों और भ्रश्टाचार का बोलबाला है। जहां देखो हर इंसान हत्या, बलात्कार और हैवानियत के डर से दहषत के महौल में जी रहा है। देष के नेता बापू, भगत सिंह जैसे महान नेताओ की षिक्षा को भूल कर सरकारी खज़ाने को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे है। नेताओ के साथ उनके परिवार वालों का चरित्र भी ढीला होता जा रहा है। इतना सुनने के बाद नारद जी ने उस षराबी से कहा कि क्या आपके अध्यापकगण, गुरू या साधू-संत आप लोगो को धर्म की राह के बारे में कुछ नही समझाते। षराबी ने कहा कि आजकल के मटुक लाल जैसे अध्यापक खुद ही लव गुरू बने बैठे हैं बाकी रही साधू-संतो की बात तो स्वामी नित्यानंद जी जैसे संत खुद ही गेरूए वस्त्र धारण करके वासना की भक्ति में लीन पड़े हुए है। इंसान भगवान को भूलकर षैतान बनता जा रहा है, क्योंकि हर कोई यही सोचने लगाा है कि यदि भगवान होते तो क्या इस धरती पर यह सारे कुर्कम हो पाते?

नारद जी ने प्रभु का ध्यान करते हुए उस षराबी से कहा कि कौन कहता है कि भगवान इस धरती पर नही है? कौन कहता है कि भगवान बार-बार बुलाने पर भी नही आते? क्या कभी किसी ने मीरा की तरह उन्हें बुलाया है? आप एक बार उन्हें प्यार से पुकार कर तो देखो तो सही, भगवान न सिर्फ आपके पास आयेगे बल्कि आपके साथ बैठ कर खाना भी खायेगे। षर्त सिर्फ इतनी हैे कि आपके खाने में षबरी के बेरों की तरह मिठास और दिल में मिलन की सच्ची तड़प होनी चाहिये। भगवान तो हर जीव आत्मा के रूप में आपके सामने है लेकिन आप लोगो में कमी यह है कि आप हर चीज को उस तरह से देखना चाहते हो जो आपकी आखों को अच्छा लगता है। अब तक उस षराबी को नारद जी की जुबान से निकले एक-एक षब्द की पीढ़ा का अभास होने लगा था। जौली अंकल तो यही सोच कर परेषान हो रहे है कि इससे पहले कि नारद जी जैसे सम्मानित गुरू प्रभु परमेष्वर को जा कर धरती के बारे में यह बताऐं कि वहां मानव दानव बनता जा रहा है उससे पहले हर मानव को मानव की तरह जीना सीख लेना चाहिये ताकि भगवान द्वारा बनाया गया पवित्र, षुद्व और खालिस माटी का खिलोना फिर से मानवता को निखार सके।

Wednesday, May 11, 2011

इंतज़ार - जोली अंकल का एक और रोचक लेख

’’ इंतज़ार ’’

मसुद्दी लाल जी के बेटे की षादी जैसे ही तह हुई तो वो किसी रिष्तेदार को न्योता देने की बजाए सबसे पहले अपने खानदानी दर्जी के पास जा पहुंचे। उन्होने दर्जी से कहा कि यदि तुम्हें ठीक से याद हो तो मेरे पिता जी ने मेरी षादी के समय एक बढ़िया सी षेरवानी तैयार करने को कहा था, लेकिन तुमने आज तक वो षादी का जोड़ा तैयार नही किया। अब अगले महीने मेरे बेटे की षादी तह हुई है। मैं चाहता हॅू कि दुल्हा बनते समय वो वही जोड़ा पहने, जो मेरे पिता जी मेरी षादी के समय मुझे पहना हुआ देखना चाहते थे। दर्जी ने आखे टेढ़ी करते और चश्मा नाक पर चढ़ाते हुए कहा, मियां मैने आपकी षादी के समय भी कहा था, कि यदि हमसे अच्छा और बढ़िया काम करवाना है तो आपको थोड़ा इंतज़ार तो करना ही पड़ेगा। इस तरह से जल्दी के काम न तो हम ने कभी किये है और न ही हम कर सकते है। मसुद्दी लाल जी ने भी थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा कि मेैं भी अब और इंतज़ार नही कर सकता, आप इसी वक्त मेरा कपड़ा वापिस लोटा दो, मैं अपने बेटे की षादी के लिये षैरवानी कहंी और से सिलवा लूंगा।

जैसे ही मसुद्दी लाल जी षेरवानी सिलवाने के लिये कपड़ा लेकर दूसरे दर्जी के पास पहुंचे तो वो जल्दी में कहीं जा रहा था। उसने जाते-जाते इतना ही कहा कि आप 15-20 मिनट इंतज़ार करो, मैं अभी आता हॅू। मसुद्दी लाल जी ने यदि तुम 15-20 मिनट में नही आये तो। उस दर्जी ने मुस्कराहते हुए कह दिया, फिर आप थोड़ा और इंतज़ार कर लेना। कारण चाहे कुछ भी हो हमारे देश में जन्म से लेकर दुनियां को बाय-बाय करने तक हम अपना आधे से अधिक समय तो इंतज़ार करते हुए व्यर्थ में ही गवां देते है। घर से दफतर जाना हो या बाजार, राशन की लाईन हो या सिनेमा टिकट की खिड़की, बैंक में पैसे या बिजली-पानी का बिल जमां करवाना हो, हर जगह लाईन में खड़े रहते हुए हमें अपनी बारी के लिए घंटो इंतज़ार करना पड़ता है। खास तौर से आम आदमी को अपने जीवन स्तर में सुधार के लिये नेताओं द्वारा किये हुए कभी न पूरे होने वाले वादों को अमली जामा पहनाने का इंतज़ार रह-रह कर सताता है।

इंतज़ार का तो यह आलम हो गया है कि बड़े षहरों में अब एक जगह से दूसरी जगह की दूरी मील या किलोमीटर में न बता कर समय के हिसाब से बताने का चलन चल निकला है, क्योंकि कुछ किलोमीटर का फांसला तह करने में भी घंटो टैªफिक जाम के इंतज़ार में निकल जाते है। टिकट रेल गाड़ी की हो या हवाई यात्रा की उसे पाने के लिये कई-कई महीनों का इंतज़ार करना तो एक आम बात हो चुकी है। कहने को आऐ दिन तेजी से बढ़ती मंहगाई की मार से हर कोई परेषान है, लेकिन किसी भी अच्छे होटल में न तो रहने के लिये कमरा मिलता है और न ही अच्छा खाना खाने के लिये जगह। हर तरफ से एक ही जवाब सुनने को मिलता आप थोड़ा इंतज़ार करो अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई तो षायद कुछ देर में कोई जुगाड़ बन जाये।

घर में षादी-विवाह या किसी अन्य उत्सव का आयोजन करना हो, अपनी जेब से पैसा खर्च करने के बावजूद भी हमें हर जरूरी काम करवाने के लिये छोटे-बड़े सभी संबंधित लोगो का इंतज़ार करना पड़ता है। एक जनसाधारण को सबसे अधिक इंतज़ार हमारे सरकारी बाबू करवाते है। कई बार तो ऐसा भ्रम होने लगता है कि हमारे यहां लोग सरकारी नौकरी केवल दो चीजो के लिये ही करते है, पहली तनख्वाह और दूसरी छुट्टीयां लेने के लिये। उनकी इस लापरवाही से जनता को इंतजार करते हुए कितनी परेषानी होती है इस दर्द से उन्हें कोई फर्क नही पड़ता। दूसरों को इंतज़ार करवाते-करवाते इन लोगो को खुद भी हर काम में इंतज़ार करने की आदत हो जाती है नतीजतन हर काम में प्रतीक्षा करते-करते उनकी यह आदत उन्हें दूसरो की अपेक्षा बहुत पीछे छोड़ देती है। जबकि परिश्रमी लोग बिना किसी को इंतज़ार करवाएं अपना हर काम समय पर करते है और बिना किसी से कुछ भी कहें समय के साथ तेजी से आगे बढ़ते रहते है।

कुछ लोगो का मानना है कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, परन्तु यह भी सच है कि अक्सर इंतज़ार में एक-एक पल बरसो की तरह बीतता है। हर इंतज़ार में सिर्फ दर्द ही छिपा हो ऐसा भी नही है। बूढें़ माता-पिता को परदेस में बसे अपने बच्चो का, बच्चो को अपने दोस्तो का, दोस्तो को अपने प्रियजनों के इंतज़ार में भी एक आषा, एक उम्मीद दिखाई देती है। प्रेमी-प्रेमीका को अपने मधुर मिलन का इंतज़ार मधु की तरह मीठा लगता है, क्योकि वो जानते है कि जुदाई की रात कितनी भी लंबी क्यूं न हो एक दिन तो सुहानी सुबह का इंतज़ार खत्म हो ही जायेगा। एक और जिंदगी में हर किसी को अपनी मंजिल पाने का मीठा सा इंतज़ार रहता है, वही जिंदगी के आखिरी पलों में मृत्यु षैया पर मरती आखों को मोक्ष पाने की आस में आखिरी सांस का इंतज़ार करना पड़ता है।

समझदार लोग तो यही मानते है कि समय सर्वाधिक अमूल्य है अतः हमें इसे एक दूसरे के इंतज़ार में बेकार गवाने की जगह सदैव इसका सदृपयोग करना चहिए। यदि इंतज़ार की इस बुरी लत को खत्म करना है तो उसके लिये केवल दृढ़ निश्ठा, संकल्प और इच्छाषक्ति की जरूरत है, इन सभी के आगे इंतजार का टिक पाना अंसभव है। इंतजार का अच्छे से इंतजार करने के बाद जौली अंकल यही निचोड़ निकाल पाये है कि व्यर्थ के इंतजार में समय गवाने की बजाए यदि सारा ध्यान कर्म पर केद्रित किया जाये तो सफलता खुद ही तुम्हारे ़द्वार चल कर आ जाती है।

Tuesday, May 3, 2011

मन की शक्ति - जोली अंकल का एक और रोचक लेख

’’ मन की षक्ति ’’

बंसन्ती के बेटे गप्पू ने अपने स्कूल का होमवर्क करते हुए अपनी मम्मी से पूछा कि नारी का मतलब क्या होता है? बंसन्ती ने बेटे को समझाया कि नारी का मतलब होता है षक्ति। इसी के साथ गप्पू ने अपनी मां से दूसरा सवाल कर डाला कि अगर नारी षक्ति होती है तो फिर पुरश को क्या कहते है? बंसन्ती ने कहा कि इस सवाल का जवाब तो तुम्हारे पिता अच्छे से दे सकते है क्योंकि उन्हें अपने पुरश होने पर बहुत गर्व है। इससे पहले कि गप्पू कुछ और सवाल खड़ा करता उसके पिता ने कहा कि तुम्हारी मां ने यह तो बता दिया कि नारी षक्ति होती है पंरतु उसे यह कहने में क्यूं षर्म आ रही है कि पुरश का दूसरा नाम सहनषक्ति होता है। एक-दो पल कुछ सोचने के बाद गप्पू ने अपने मम्मी-पापा से कहा कि आपने षक्ति और सहनषक्ति के चक्कर में डाल कर मुझे और उलझा दिया है। मुझे तो ठीक से इतना बता दो कि सबसे बड़ी षक्ति कौन सी होती है? गप्पू के पिता ने उसका सही मार्गदर्षन करते हुए कहा कि बेटा सबसे बड़ी षक्ति तो हमारे मन की षक्ति होती है।

गप्पू ने थोड़ा डरते हुए अपने पापा से पूछा कि यदि हम सभी के अंदर इतनी षक्ति होती है तो फिर आप मम्मी के सामने आते ही परेषान होकर घबराने क्यूं लगते हो? अब उसके पापा ने अपनी नजरें टेढ़ी करते हुए कहा कि बेटा यह सच है कि तेरी मम्मी के आगे मेरी एक नही चलती लेकिन अभी तुम्हारे दूध के दांत टूटे नही और तुम चले हो अपने ही पापा की टांग खीचने। इससे पहले कि गप्पू के पापा उसे और भाशण सुनाते बंसन्ती ने कहा कि तेरे पापा जैसे लोग मन की षक्ति के अभाव में मेहनत, हिम्मत और लगन से काम करके भी अपनी कल्पनाओं को साकार करने की बजाए बनते हुए काम को ही गुड़ गोबर कर देते है। ऐसी स्थिति में इस तरह के डरपोक लोगो का मन हर समय चिंता में डूबने लगता है। जबकि हर कोर्इ्र जानता है कि चिंता किसी भी आने वाली समस्यां को हल नही कर सकती, बल्कि चिंता तो हमारी आज की खुषियों को भी जला कर राख कर देती है। जो लोग अधिक चिंता करते है उनके मन की षक्ति तो खत्म होती ही है साथ ही उनके दिल में सकारत्मक विचार आने की बजाए उनकी बुद्वि और षरीर सब कुछ बिगड़ने लगता है। तेरे पापा जैसे लोगो ने जब खुद को सफलता की कसौटी पर कसने की बजाए दिन रात कोल्हू के बेैल की तरह परिश्रम करते हुए सारी उम्र काट देने की कस्म खाई हो तो यह अपने दुष्मनों पर विजय कैसे पा सकते है? बेटे जिस इंसान में आत्मषक्ति की कमी होती है वो चाहें कितनी ही मेहनत क्यूं न कर ले वो कभी भी अपनी मंजिल को नही पा सकता।

गप्पू ने अपनी मम्मी से पूछा कि क्या यह षक्ति बच्चो में भी आ सकती है। यहां बसन्ती को कहना पड़ा कि कोई बच्चा हो या बड़ा, कभी भी किसी इंसान को यह नही सोचना चाहिए कि यह काम उससे नही होगा। हर व्यक्ति हर काम को अच्छे से कर सकता है। सिर्फ जरूरत है अपना पूरा जोर लगा कर अपने लक्ष्य की और ध्यान देने की। कुछ लोगो में कई कारणों से मन की षक्ति का पूर्ण विकास नही हो पाता लेकिन हर कोई इस राह की चाह रखने वाला इसे धीरे-धीरे बढ़ा कर अपने मन में पैदा कर सकता है। यह सच है कि एक आम आदमी छोटे से दुख को देखते ही घबराता है लेकिन जो कोई दुख का सामना हिम्मत से करता है सुख भी वोहि पाता है। जिस किसी के मन में मन की षक्ति की जगह भय रहता हो वो स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी किसी खतरे से कम नही होता।

बंसन्ती ने अपने बेटे गप्पू को आगे समझाते हुए कहा कि जमाने में किसी परिवर्तन की बात या अथवा षरीर में किसी कारण से कोई कमी पेषी हो तो भी मन को निरंतर स्थिर बनाएं रखना चाहिए। इसके जादू से दुख की घड़िया भी पल भर में दूर हो जाती है। मन की षक्ति तो अपने आप में एक ऐसा अस्त्र है कि आप इसके एक तीर से कई निषाने लगा सकते हो। मन की ऊर्जा से आप बड़े से बड़े ताकतवर को भी षिकस्त दे कर षत प्रतिषत सफलता पा सकते है। जो लोग सच्चे मन से कोई भी कार्य करते है उन्हें न केवल संतुश्टि और ताकत मिलती है बल्कि सफलता दिलाने में भाग्य भी उनका साथ देता है। वैसे तुम्हें यह बता दू कि मन की षक्ति में तो वो ताकत होती है कि आप उससे जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हो। जो इंसान अपने अंदर यह क्षमता जगा लेता है उसके जीवन में सुख, समृद्वि एवं सफलता के द्वार अपने आप खुलने लगते है।

बेटे की पीठ पर हाथ रखते हुए उसकी मां बंसन्ती ने कहा कि इसी के साथ एक बात और बता दू कि जिस तरह किसी का मन और सोच होती है उसे वैसे ही सब कुछ मिलता है। अब तितली के जीवन को ही देख लो, उसे बेचारी को भगवान सिर्फ 14 दिन की उम्र देकर भेजता है। रंगबिंरगी फूलों से नाजुक तितलियां इन 14 दिनों में ही हजारों-लाखों मील का सफर तह करने के साथ हर किसी को खुष करते हुए अपनी और आकर्शित करती है। दूसरी और कछुआ 400-500 साल जी कर भी न तो अपने लिये और न ही किसी दूसरे के लिये कुछ भी कर पाता है। अंत में एक बात और याद रखना कि दुष्मनों पर विजय पाने वालों की तुलना में उसे षूरवीर मानना अच्छी बात है जो अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है क्योंकि सबसे कठिन विजय, अपने मन पर विजय पाना होता है। जौली अंकल अपने अनुभवों के आधार पर इसी निश्कर्श पर पहुंचे हेै कि हर व्यक्ति को बुलदिंयो तक पहुचने की हिम्मत सिर्फ मन की षक्ति ही दे सकती है।

’’ जौली अंकल ’’

एक और रोचक लेख - जोली अंकल

’’ फारेन रिटर्न्ड ’

आजकल आप किसी भी दफतर में फोन लगाऐं तो पहले की तरह किसी मधुर भाशी स्वागती कन्या की आवाज की जगह कम्पयूटर की झनझहाट भरी आवाज सुनाई देती है। कुछ दिन पहले एक सज्जन ने षादी ब्यूरों में कुछ जानकारी लेने के लिये फोन लगाया तो उधर से आवाज आई कि रिष्ते की बात करने के लिये कृप्या एक दबाएंे, सगाई से जुड़ी बातचीते के लिये दो दबाऐं, षादी की जानकारी के लिये तीन दबाऐ। उस मनचले ने मजाक में कह दिया यदि दूसरी षादी करनी हो तो क्या दबाऐ? झट से कम्पूयटर ने जवाब दिया कि उसके लिये आप अपनी पहली बीवी का गला दबाऐं। बाकी सभी धंधो में दलालों की तरह षादी के यह दलाल भी अपने काम में इतने माहिर होते है कि एक बार कोई इनकी गली से गुजर जाऐ तो यह तब तक उसका पीछा नही छोड़ते जब तक दुल्हे को सेहरा या दुल्हन के हाथ पीले न हो जाये।

देसी दुल्हों के मुकाबले फारेन रिटर्न्ड दुल्हों की हमारे देष में सदा से भारी मांग रही है। विदेषी दुल्हा चाहें उंम्र के किसी भी पढ़ाव का हो। यहां तक की कई बार तो ऐसे दुल्हों के मुंह में दांत और पेट में आंत तक नही होती परन्तु विदेष से लौटते ही उसका स्वागत फूल मालाओं के साथ-साथ ढ़ोल धमाके के साथ किया जाता है। गांव के अधिकांष लोग अपने सभी जरूरी काम काज छोड़ कर उस फारेन रिटर्न्ड के स्वागत की तैयारीयों में लग जाते है। फारेन रिटर्न्ड लोगो को जहां एक तरफ रिष्तेदार-दोस्तो का भरपूर प्यार मिलता है, वहीं दूसरी और डालर में कमाई करने वाले से अपनी लड़की का रिष्ता करने वालों की एक लंबी कतार लग जाती है।

ऐसे लोगो का काम हमारे यहां रिष्तो की दलाली करने वाले और भी आसान कर देते है। षादी से जुड़े हर प्रकार के सामान के साथ यह लोग रिष्तेदारो का भी किराये पर मंगवाने का इंतजाम कर देते है। यदि कोई मां-बाप कभी गलती से लड़के की योग्यता, आमदनी या घर-बाहर के बारे में कुछ पूछ ले तो षादी करवाने में निपुण दलाल हर सवाल का एक ही जवाब देते है कि आप कमाल कर रहे हो। लड़का फारेन रिटर्न्ड है, और आप न जाने किस प्रकार के सदेंह में पड़ते जा रहे हो। अगर आप को लड़के की काबलियत पर कोई षक है, तो आप यह रिष्ता रहने ही दो। मैने तो आपको अपना समझ कर आपके भले की सोची थी। ऐसी चंद उल्टी-सीधी बातों में लड़की वालों को उलझा कर यह दलाल लोग होटल में दरबान की नौकरी करने वाले को उस होटल का मालिक बना कर रिष्ता पक्का करवा ही देते है।

आज अग्रेजों को भारत छोड़े एक जमाना हो चुका है। फिर भी न जानें हमारे टैक्सी ड्राईवर से लेकर फाईव स्टार होटल वाले अधिकतर लोग आज भी गोरी चमड़ी वालो को देखते ही सर-सर कह कर दुम क्यों हिलाने लग जाते है? गोरी चमड़ी वाला कहां से आया है, उसका उस देष में क्या रूतबा है, इसके बारे में सोचना तो दूर हम जानने तक की कोषिष नही करते। गोरे लोगो की बात तो छोड़ो यदि हमारे गांव का कोई व्यक्ति चार-छह महीने विदेष के किसी होटल में दरबान की या सफाई कर्मचारी की नौकरी कर के जब देष वापिस लौटता है तो हम लोग झट से उसके नाम के साथ फारेन रिटर्न्ड का तगमा लगा देते है।

यह तगमा अपने देष में अच्छे से अच्छे पढ़े लिखे लोगो की डिग्रीयों से कहीं अधिक भारी और चमकदार होता है। फारेन रिटर्न्ड तगमें की चमक इतनी चमकीली होती है कि हमें उसके आगे कुछ दिखाई ही नही देता। आपस में चाहे सारा दिन गाली गलौच करते रहे, लेकिन ऐसे लोगो के सामने हर कोई बड़ी ही संजदीगी से पेष आता है। अब यदि फारेन रिटर्न्ड का ताल्लुक किसी गांव से है, तो सोने पर सुहागे वाली कहावत अपनी चमक पूरी तरह से दिखाने लगती है। जरा गौर से देखो, कि अब फिजा बदल रही है। दुनियां में सबसे ताकतवर देष के राष्ट्रपति न सिर्फ हमारे देश के प्रधानमंत्री से लेकर साधारण बच्चो की तारीफ कर रहे है बल्कि दबी जुबान से अपने देष के बच्चो को दुसरे देषो के मुकाबले पिछड़े होने की चेतावनी भी दे रहे है। समय की मांग है कि हम अपने अतीत को भूल कर यह विचार करे की वर्तमान में हमें अब क्या करना है, क्योंकि दुनियां में वास्तविक सम्पति धन नही मन की प्रसन्नता होती है।

जौली अंकल से इस बारे में पूछे तो यही जवाब मिलेगा कि बेवकूफ की सबसे बड़ी अक्कलमंदी खामोषी है और अक्कलमंद का ज्यादा देर खामोष रहना बेवकूफी होता है। जिस मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार आप को है, उस में भी रायमषविरा करने में कोई हर्ज नही होता। किसी विषय के बारे में पूरी जानकारी न होने से अधिक षर्म की बात यह होती है कि उस बारे में पूरी जानकारी न लेना। धन के लालच में बच्चो की खुषियों को कुर्बान करने को तो आप भी अक्कलमंदी नही कहेंगे, फिर चाहे दुल्हा फारेन रिटर्न्ड ही क्यूं न हो?