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Friday, May 20, 2011

जोली अंकल का एक और रोचक लेख

’’ पारखी नजर ’’

बंसन्ती ने वीरू से कहा कि आप तो हर समय अपनी अक्कल के घोड़े दौड़ाते रहते हो, क्या मैं आपको 35 साल की लगती हॅू। वीरू ने कहा कि कौन बेवकूफ अब तुम्हें 35 साल की कहता है, जब थी उस समय लगती थी। बंसन्ती ने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा कि मैं तो तुम्हें बहुत पारखी समझती थी लेकिन तुम हो अक्ल के पीछे लठ लिए फिरते रहते हो। अच्छा अब फालतू की बाते छोड़ो मुझे बस इतना बता दो कि तुम मुझे कितना प्यार करते हो? वीरू ने कहा कि यह कोई कहने की बात है, इतना तो तुम भी जरूर जानती होगी कि मै तो तुम्हे बेहिसाब प्यार करता हॅू। बंसन्ती ऐसे नही फिर भी ठीक से बताओ तो सही, मुझे अच्छा लगेगाा। वीरू ने कहा कि मै तो तुम्हारा झूठा जहर भी पी सकता हॅू, अगर एतबार न हो तो किसी दिन भी परख लेना क्योकि तुम तो खुद ही बहुत बड़ी पारखी नजर रखती हो।

एक दिन वीरू अपने बाल कटवाने के लिये नाई की दुकान पर गये। जैसा कि हर कोई जानता है कि अधिकांश नाई लोग अपना काम करते समय एक पल भी चुप नहीं रह सकते। वो किसी न किसी विषय पर अपनी राय देते ही रहते हैं। फिर चाहे वो गली-मुहल्ले की कोई परेषानी हो या देष की कोई गम्भीर समस्या। वीरू से बात करते-करते मुद्दा भगवान के होने या न होने पर आकर रुक गया। वीरू के लाख समझाने पर भी नाई अपनी बात पर अड़ा रहा कि दुनिया में भगवान नाम की कोई चीज नहीं है।

यदि भगवान सचमुच होता, तो फिर दुनियॉ में हर तरफ यह दुख ही दुख, गरीबी, भुखमरी, कत्ल और लूटपाट क्यो होते? लोग बीमार क्यूं होते? बच्चे अनाथ क्यंू होते? अस्पताल मरीजों से यंू तो न भरे रहते, गरीबी और लाचारी की वजह से लोग आत्महत्या क्यंू करते? आप कहते हो कि भगवान सबको बहुत प्यार करते हैं। तो क्या भगवान को अपने प्रियजनों का तड़पते देख यह सब कुछ अच्छा लगता है? जब वीरू की भगवान के आस्तित्व के बारे में सभी दलीलें फेल हो गईं तो वो बुझे मन से अपना काम खत्म होते ही एक समझदार इन्सान की तरह चुपचाप उस नाई को पैसे देकर चल दिय, क्योंकि मुसद्दी लाल जी इस बात को अच्छी तरह से समझते है कि कभी भी किसी मूर्ख से नही उलझना चहिये क्योंकि ऐसे में वहां खड़े सभी देखने वाले को दोनों ही मूर्ख प्रतीत होते है।

जैसे ही वीरू उस नाई की दुकान से बाहर आया, तो उन्होंने देखा की उस बस्ती में काफी सारे लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। मुसद्दी लाल तुरन्त वापिस आये और उस नाई से बोले कि मुझे लगता है, कि तुम्हारी सारी बस्ती में कोई भी नाई नहीं है। नाई ने हैरान होते हुए कहा, कि यह आप क्या कह रहे हो? अभी तो मैने तुम्हारे बाल काटकर ठीक किये है, और तुम कह रहे हो कि यहां कोई नाई नहीं रहता। वीरू ने अब अपनी बात कहनी षुरू की, जैसे ही मैं तुम्हारी दुकान से बाहर निकला तो मैंने देखा कि बहुत से लोग बहुत ही लबंे और गन्दे बालों के साथ यहां-वहां घूम रहे हैं। नाई बोला उससे क्या होता है? मैं तो यहां अपना काम कर रहा हूं,। अब जब तक कोई मेरे पास आयेगा ही नहींे तो मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ कर तो उनके बाल नही संवार सकता।

अब बात पूरी तरह से वीरू की पकड़ में आ गई। उन्होंने उस नाई को समझाना षुरू किया कि तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। जैसे यह लोग जब तक तुम्हारे पास नहीं आते, तब तक तुम इनके लिये कुछ नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही भगवान तो इसी दुनिया में है, लेकिन जब तक हम लोग उसके करीब नही जायंेगे, तब तक वो हमारे लिये क्या कर सकता है? उसकी मदद और आषीर्वाद के बिना तो हमें हर प्रकार के दुख और तकलीफों का सामना करना ही पड़ेगा। प्रभु का आर्षीवाद पाने के लिए हमें ने कर्म करने होगे। कर्म किए बिना फल की इच्छा करना ठीक वैसा ही है जैसे पेड़ लगाए बगैर फल की उम्मीद में बैठे रहना। जो व्यक्ति इस तरह की छोटी-छोटी बातों को सही-सही समझ लेता है उसी की नज़र पारखी बन जाती है।

कहने को तो विज्ञान तेज़ी से तरक्की कर रहा है, परंतु सच्चाई यह है कि हम वास्वतिक जिंदगी की असलियत को भूलते जा रहे हैं। नतीजतन हम अपने परिवार, और समाज के साथ-साथ भगवान से भी दूर होते जा रहे हैं। जो कोई भगवान के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान या आस्था रखता है, वो खुद को अंहकारवश बड़ा विद्ववान और दूसरो को मूर्ख समझने लगता है। किसी धर्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी या यू कहियें कि आधा-अधूरा ज्ञान रखने वालों का घंमड तो सातवें आसमान पर देखने को मिलता है। वो बाकी समाज के लोगो को हर समय यह जताना नहीं भूलते की वो भगवान के सबसे नज़दीक और खास है। जबकि पारखी नज़र वाले तो यही मानते है कि जिस तरह सूरज एक, चांद एक है उसी तरह भगवान भी एक है बस सिर्फ उसके नाम अनेक है। ऐसे लोगो का यह अटूट विष्वास होता है कि प्रभु को किसी भी नाम से पुकारा जायें वो हर किसी की सुनता है।

अंधविष्वासी लोग अक्सर यह कहते है कि क्या आज तक किसी ने भगवान को देखा है? क्या कोई भगवान को देख सकता है? जिस चीज को हम देख नहीं सकते, क्या उसका अस्तित्व कैसे हो सकता हैं? यह कुछ ऐसे प्रष्न है, जिनका जवाब आज तक षायद किसी को नहीं मिल पाया। परंतु पारखी लोगो की माने तो उनका कहना है कि भगवान की बात तो छोड़ो, क्या कभी किसी ने फूलो की खुषबू या अपने सिरदर्द को देखा है? हम केवल ऐसी चीजो को महसूस ही कर सकते हैं। अगर हमने यह छोटी-छोटी चीजे नहीं देखी, तो भगवान के अस्तित्व पर प्रष्न उठाने वालों की समझ के बारे में क्या कहंे?

जिस प्रकार किसी जानवर को मंहगे सोने-चांदी और हीरे-मोतियों की समझ नही होती, वो उन्हें छोड़ कर भी घास के पीछे ही भागते है। इसका मतलब यह तो नहीं कि हीरे-मोतियो की कोई पहचान या कीमत खत्म हो गई, ठीक उसी तरह भगवान तो हर कण-कण से लेकर छोटे-बड़े जीव में मौजूद है। जौली अंकल की सोच तो यही कहती है कि भगवान को देखने के लिये केवल एक सच्चे हृदय एवं पारखी नजर की जरूरत है। सितारों की दूरी और समुंद्र की गहराई को मापने का दावा करने वालों से भी वो इंसान महान है जो दूसरों के साथ खुद को जानने के लिये पारखी नज़र रखता है।

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