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Thursday, March 15, 2012

बेचारे पति



वीरू के एक दोस्त ने उससे कहा कि यार एक बात समझ नही आती कि तू सारे मुहल्ले में तो बब्बर षेर बना घूमता रहता है। जरा सी बात होते ही तू हर किसी से झगड़ा करने पर ऊतारू हो जाता है। परंतु घर के अंदर जाते ही तू भीगी बिल्ली क्यूं बन जाता है? वीरू ने थोड़ा दायें-बायें देखने के बाद उससे कहा कि मैं घर में भी षेर ही होता हू बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि घर में हर समय मेरे ऊपर दुर्गा सवार रहती है। वीरू ने रसोर्इ में बर्तन धोते हुए अपने उस लेखक दोस्त से कहा कि तुम हर विशय पर कुछ न कुछ लिखते रहते हो। कभी एक बार पतियों के बारे में भी कुछ लिखो कि पति बेचारा भी आखिर इंसान होता है। उसे भी घर में मामलों में बोलने का थोड़ा बहुत हक होना चाहिये। लेखक महोदय ने उससे कहा कि वो तो ठीक है जो कहोगे वो मैं लिख दूंगा। लेकिन पहले यह तो बता कि तेरे घर में तो बहुत पहले से एक अच्छी सी नौकारानी है, फिर तू सारे घर के कपड़े और बर्तन क्यूं धोता है? वीरू ने अपनी सफार्इ देते हुए दोस्त को बताया कि मैने जिंदगी में सबसे बड़ी यही बेवकूफी की है कि उस काम करने वाली से षादी कर ली है।

वीरू की दर्द भरी फरमार्इष को ध्यान में रखते हुए उस लेखक महाषय ने एक समाचार पत्र में इस विशय पर एक अच्छा सा लेख लिख दिया। जब वीरू ने अखबार में यह लेख छपा देखा तो झट से लेकर अपनी पत्नी के पास जाकर बोला कि यह देखो, आज तो अखबार में यह छप गया है कि पतियों को भी घर के मामलों में बोलने का हक होना चाहिये। वीरू की पत्नी ने अखबार को एक तरफ रखते हुए कहा कि तुम्हारे इस लेखक दोस्त ने भी सिर्फ लिखा ही है वो भी अपनी पत्नी के सामने बोल तो नही पाया। जिस तरह खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है ठीक उसी तरह वीरू अपने कुछ पहलवान दोस्तो को देख कर्इ बार पत्नी को मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत जुटाने की नाकाम कोषिष करता रहता है। लेकिन यह सब कुछ उसके ऊपर उसी तरह उल्टा पड़ता है जैसे कि वो कहावत महषूर है कि सौ सोनार की एक लोहार की। वीरू चाहे बहादुरी दिखाने का कितना ही प्रयास क्यूं न कर ले लेकिन उसकी पत्नी अपने नाक पर मक्खी तक नही बैठने देती। घर में वीरू की हालात को देख उसके सारे दोस्तो ने उसे जोरू के गुलाम की पदवी से नवाज दिया हैं। वीरू अपनी पत्नी से इतना डरता है कि लाख चाह कर भी न तो मनचाहे खाने के लिये कह सकता है और न ही कभी अपनी पंसद के कपड़े पहन सकता है।

एक दिन वीरू ने तंग आकर अपनी पत्नी से कहा कि जिस तरह तुम सारा दिन मेरे ऊपर हुक्म चलाती हो, मुझे लगता है कि तुम किसी साधारण बाप की नही बलिक हिटलर के खानदान से हो। वीरू की पत्नी ने कहा कि मेरे पिता कोर्इ हिटलर वगैरहा नही बलिक एक बहुत बड़े गायक थे। वो जब कभी भी गाना गाते थे तो उड़ते हुए पंछी खुद ब खुद नीचे गिर जाया करते थे। वीरू ने हैरान होते पत्नी से कहा कि तानसेन जी के बारे में तो महषूर था कि वो जब भी गाना गाते थे तो कर्इ दीये खुद ब खुद जल उठते थे। कर्इ बार उनके गाने से बरसात होने लगती थी लेकिन तुम्हारे पिता जी क्या मुंह में कारतूस भर कर गाते थे जोकि पंछी मर कर नीचे गिर जाते थे।

इतना सुनते ही वीरू की पत्नी कु्रद्व होते हुए उससे बोली कि जब मुझ से दिल लगाया था तो उस समय तुम क्या अंधे थे? उन दिनों में तो तुम्हारे मुंह से एक ही बात निकलती थी कि जब भी मैं तुम्हारे साथ होती हू तो तुम्हारा दिल आसमान में उड़ने लगता है। वीरू ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा कि उसी घड़ी को याद करके पछता रहा हू जब मैने तुमसे षादी के लिये बात की थी। षादी से पहले तो तुम षांति की देवी लगती थी। लेकिन षादी करते ही न जाने तुम्हें कैसी हवा लगी है कि उसी दिन से तुमने मेरा दिन-रात का चैन और नींद हराम की हुर्इ है। मैने तो आज तक यही सुना था कि भारतीय नारी अहिंसक, सहनषील और स्नेहषील होती है। अब इससे पहले कि वीरू कुछ और बोलता पास खड़े उसके लेखक मित्र ने उसे बताया कि पतिनयां अक्सर दो तरह की होती है। एक जो पति को गुलाम बना कर रखने में विष्वास रखती है और दूसरी जो खुद पति की गुलाम बन कर रहना पंसद करती है। मुझे तुम्हारी अक्कल पर तरस आ रहा है कि जहां आज तेजी से बदलते जमाने में औरते राजनीति में अपनी धाक के झंड़े गाड़ रही है। सोनिया गांधी जैसी औरत देष की सबसे ताकतवर महिला मानी जाने लगी है वहां तुम यह कैसे उम्मीद कर सकते हो कि पत्नी तुम्हारी गुलामी बर्दाषत करेगी?

वीरू जैसे नादान लोग अपनी कमियां तो देखते नहीं लेकिन हर समय दूसरों के दोश ढूंढने का काम करते रहते है। जबकि दूसरो के दोश ढूंढना बहुत आसान है और अपने अंदर झांकना सबसे मुषिकल लगता है। वीरू और उसकी पत्नी के सारे प्रसंग को देख जौली अंकल हर किसी को यही परामर्ष देना चाहते है कि यदि आप में कोर्इ अच्छार्इ हो तो यह समझो कि दूसरो में तुमसे कहीं अधिक अच्छार्इ है। हमारा जीवन तो एक नाटक की तरह है, यदि हम इसके कथानक को ठीक से समझ लें तो सदैव प्रसन्न रह सकते हंै। इतना तो हर कोर्इ जानता है कि जिस परिवार में अषांति रहती है वहां भगवान भी निवास नही करते। बात चाहे पति-पत्नी की हो या किसी अन्य रिष्ते की, मानवता तो यही कहती है हर किसी के साथ प्यार से रहते हुए खुद भी जियों और बेचारे पतियों को भी जीने दो।

जौली अकल

यह लेख जोली अंकल की नई पुस्तक अनमोल खुशियाँ से लिया गया है.

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